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गर्माहट प्यार की

दिसंबर का महीना और बहार का तापमान -२५ डिग्री,पर आरोही की सहेली का जन्मदिन है तो घर से तो निकलना पड़ेगा, ऐसे मैं मुझे याद आया एक अनमोल तोहफा और फिर हम सब ने पहने प्यार की गर्माहट लिए आईजी के हाथों बिने स्वेटर।

पुरे बचपन और लड़कपन की सर्दियाँ इन्ही हाथों से बने स्वेटरों में बीती हैं पर आज न जाने क्यों बच्चों को स्वेटर पहनाते हुए जो महसूस हुआ वो पहले कभी नहीं हुआ। शायद ये उम्र का असर है और समय आपने साथ साथ हमे उन सब चीजों की क़द्र करना सिखा ही देता है जिनकी अहमियत हम समझ नहीं पाते। बच्चे सुन्दर स्वेटर पहन के बड़ा खुश थे और जैसे ही मैंने स्वेटर पहना तो आज न जाने क्यों मन भर आया।

आज पहली बार समझ समझ आया की ये गर्माहट सिर्फ ऊन की नहीं बल्कि ये गर्माहट है प्यार की जो एक-एक फंदे के साथ बिना है आईजी ने इस स्वेटर में। ये गर्माहट है सर्दी की उन दोपहरों की जब धूप सेकते हुए एक-एक पल्ला पूरा किया होगा। ये गर्माहट है उस स्नेह की जब हर बार आईजी ने हमारी नाप लेने के लिए मुझे और बच्चों को अपने मन की नाप में मापा होगा। हिचकी तो जरूर आयी होगी तब हमें पर क्यों कोई याद कर रहा है ये समझ न आया होगा।

सर्दी की वो दोपहरें भी क्या ख़ास थी जब चूल्हा चौका करके, पास पड़ोस के सभी लोग साथ में आँगन में धूप सेकते। नीला साफ आसमान और सर्दियों की चटख धूप में बैठे इधर- उधर की बातें करती आमा, आईजी, ताईजी बुआ और चाची न जाने कितनी नयी नयी बिनाईंयां एक दूसरे को सिखाती और ऊन के रंग बिरंगे गोलों से रिश्तों में नयी गर्माहट बुनती जाती।

सभी बुनाई में निपुण तो थी पर हर एक की अलग विशेषज्ञता भी थी। सभी के अपने खास डिज़ाइन होते और किसी के हाथ की सफाई इतनी सुन्दर की पुरे मोहल्ले में किसी का भी स्वेटर हो सभी में गाला बिनने की जिम्मेदारी उन्ही की होती।

सिर्फ स्वेटर ही नहीं , तरह तरह की टोपी, कनछुप्पा मोज़े, दस्ताने सभी इन निपुण हाथों से ही बनते और पूरी सर्दियाँ हमें गर्म रखते।

हम बच्चों को पहले लच्छी से गोले बनाने का काम मिलता या फिर कभी-कभी पुरानी स्वेटर उधाड़ने का। थोड़े बड़े हुए तो गर्मी की दोपहरों सबके लिए चाय बनाने की जिम्मेदारी भी मिलने लगी और इसी बीच न जाने कब सब ने मिल के हम बच्चों को भी फंदे डालना और तरह-तरह की बिनाइयाँ भी सिखायी। कभी नीम्बू सानने के लिए भांग भूनते तो कभी खट्टे मीठे माल्टों का मजा लेते हुए होम साइंस की फाइल के लिए हर एक नए डिज़ाइन के छोटे छोटे नमूने इकट्ठे किये हैं जाड़ों की उन यादगार दोपहरों में।

बचपन में सीखी इस कला को भूलना मुश्किल है। आरोही के लिए मैंने भी कुछ स्वेटर बुने। कुछ सही बने और कुछ नहीं पर आरोही के बाद श्रीजीता को भी पहनाये। बच्चों के लिए उनकी दादी, नानी और बुआ हमेशा ही कुछ न कुछ बिन के रखती है और अच्छा लगता जब बच्चे भी हाथ के बने स्वेटर पहन के इतराते हैं। और इतरायें भी क्यों न , आख़िर ये गर्माहट तो अपनों के प्यार की है जो बड़े स्नेह से एक एक फंदे में बिनि गयी है।

यादों का रस

अगर आप उत्तराखंड से हैं  तो आप समझ ही गए होंगे की आज मैं कौन सी याद साझा  करने वाली हूँ। 

रस!  सिर्फ एक व्यंजन नहीं।  रस का अर्थ  है, घर !  घर की  रसोई, आमा, इजा , बुआ  का बड़े प्यार  से सिल में पिसा हरे धनिये का नमक, खेत के नींबू और भांग  की चटनी, ताज़ी मूली  का सलाद और  साथ में पालक या लाई  का टपकी साग।  आया न पानी मुँह में? 

सर्दियों के दिनों में पूरे परिवार के लिए बड़ी सी लोहे की कड़ाई में धीमी आँच में काफ़ी देर तक पकने वाला पौष्टिक रस, उस पर हींग, जम्बू और गंदरेंणि  के तड़के की खुशबु , और वो दाल के बचे गूदे में प्याज, टमाटर और हरी मिर्च का नामक मिला के बनने वाली चाँट इसके आगे अच्छे से अच्छे स्वाद फीके है।  ये मेरा विचार है पर मुझे विश्वास है की अगर आपने रस का स्वाद चखा है तो शायद आप का भी यही विचार होगा।

जब छोटी थी तब मैं खाने के  मामले मैं बड़ी नखचड़ी थी। घर में सबसे छोटी थी तो सबसे अपनी बात मनवा भी लेती थी।  चाहे आमा ने रसोई में चैंसा बनाया हो या बड़ी, भट का जौला हो या चुड़कानी, मेरे लिए तो हमेशा झोली ही बनती थी। कोई भी हरी सब्ज़ी हो,मैंने कभी नहीं खाई और जब भारती बड़े स्वाद से पालक की कड़ाई में भात खाती तो मुझे लगता था कि पता नहीं कैसे खाती है। लगभग १६ साल की होने तक या शायद  उसके बाद तक भी  मैंने कभी भी झोली और राजमा के अलावा कोई दाल नहीं चखी। 

मुझे याद नहीं की कब मैंने वो सब कुछ खाना शुरू किया जो भी घर पे बनाता था। शायद तब जब घर से बाहर हॉस्टल गई और घर के खाने का महत्व समझ आया। और जब घर का बना सब खाना खाया तो ये एहसास जरूर हो गया की इतने साल मैंने अपने आपको कितने अनोखे  स्वादों से दूर रखा।

आज जब भी मैं घर जाती हूँ  मेरे लिए  रस-भात जरूर बनता है और उस थाली मैं जैसे साल भर से संभलकर रखा सारा प्यार परोसा होता है। और ऐसे ही आज लगभग  इग्यारह- बारह साल पुराना एक मजेदार किस्सा याद  आ रहा है।

मेरा ददा और उसका दोस्त नितिन तब गुड़गांव में रहते थे। आईजी -बब्बा को गुड़गाव् आये थोड़े ही दिन हुए थे। मैं ऑफिस के किसी काम से कोटा से लौट रही थी तो दो दिन के लिए गुड़गांव ही रुक गयी। जब मैं सुबह सुबह गुडगाँव पहुंची तो आईजी ने रस की तैयारी करके रखी थी ,थोड़ी देर में रस की खुशबु ने बड़ी भूख जगा दी पर ददा और नितिन कहीं गए थे तो मैं उनका इंतज़ार करने लगी।आईजी बब्बा को खाना खिला के धुप में चली गयी और मैं नहाने।  सफर के कपडे धोने में मुझे थोड़ा टाइम लगा और इधर दादा लोग बहार से वापस आये और उन्हें लगा हम खाना खा चुके तो दोनों ने खाना खा लिया। 

 इस बात से अनजान मैंने  नहाने के बाद उनको खाना खाने बुलाया तो जैसे ही वो बोले कि  हम तो खा चुके, मैं दौड़ के  डाइनिंग टेबल पे गए गयी  और लगभग खाली कड़ाई देख के मेरा रोना शुरू हो गया।  इधर दोनों हैरान से मुझे देख रहे थे और उधर आईजी बहार से आयी तो वो मेरा रोना देख के हंसने लगी। गलती न तो मेरी थी और न ही उन दोनों की पर अब रस तो थोड़ा ही बचा था जो सुबकिया लेते हुए मैंने खाया और नाराज मैं अपने कमरे मैं चली गयी।  शाम को नितिन मेरे लिए  मेरी पसंद के मोमो ले के आया पर  मोमो और रस की क्या बराबरी। आईजी ने जब दूसरे ही दिन फिर से रस बनाया और फिर जब जी भर के खाया  तब जा के मेरी नाराजगी दूर हुयी।  

पहाड़ में रस लगभग हर घर में बनता है पर हर घर की कहानी की तरह रस को बनाने का तरीका और स्वाद अलग अलग है। तो आज मुझे रस के विषय में लिखने की क्या  सुझी। इसकी वजह है , घर से दूर मेरा एक और परिवार जिसके सब सदस्य भारत के अलग अलग क्षेत्र से हैं। गर्मियों में मेरी सास जब आयी तो सबने पहाड़ी स्वाद की फ़रमाइश करी। मैं और मम्मी बड़ी सोच में पड़े कि इतने अलग अलग व्यंजन हैं क्या बनाया जाय? क़िस्मत से यहाँ गहत की दाल भी आसानी से मिल जाती है और आमेजन से भाँग भी मैंने माँगा रखी थी। जहां हम रहते हैं यहाँ के मौसम में नवंबर और फ़रवरी में लाई भी हो जाती है तो मेनू बना , लाइ की सब्ज़ी, मूली का सलाद , पहाड़ी रायता, बड़े , रस-भात और भांग की चटनी ।

अपने विस्तृत परिवार के साथ पहाड़ का ये स्वाद साझा करने का आनंद शब्दों में लिखना मुश्किल है। पता नहीं सबको खाना पसंद आये या नहीं ? क्या मुझे कुछ और भी बना लेना चाहिए ताकि कोई भूखा ना रहा जाए ? राजमा बना लूं क्या या छोले ? बड़े सवाल थे मन में पर एक बार खाना परोसा तो सबको बहुत पसंद आया। जादू ही कुछ ऐसा है रस का । सबके साथ खाने और बात चीत में समय ऐसा बीता की सबके जाने के बाद ध्यान आया कि हमने खाने की एक भी फोटो नहीं ली। फोटो हो या ना हो जो यादें बनी वो तो हमेशा यादगार रहेंगी ।

हमारा विस्तृत परिवार

 आयो नवल बसंत

    माघ मास की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला त्यौहार जिसे हम श्री पंचमी या बसंत पंचमी के नाम से जानते हैं, अपने साथ लेकर आता है  उम्मीदें और नया विश्वास कि  चाहे  पूस का महीना कितना भी लम्बा और सर्द  हो  बसंत ऋतू अपने साथ नयी कोपलें,नयी फसलें ,फूल और खुशहाली  लेकर अवश्य आती है। 

इस दिन ज्ञान, विद्या, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का जन्म हुआ था इसलिए बसंत पंचमी के दिन को बच्चों की शिक्षा-दीक्षा तथा अन्य  संस्कार के लिए ये दिन शुभ मन जाता है।

 जब हम छोटे थे , लकड़ी का छोटा सा बक्सा ( और कभी कभी कुछ ढोलकिया भी )  कंधे पे लटकाकर पहाड़ों के कच्चे पक्के  रास्तों पे एक आदमी माघ मास की पंचमी को घुमा करता था और जिस घर में भी छोटी छोटी बेटियां होती वहां उसे आवाज देकर बुलाया जाता और फिर कान छिदवाये जाते और साथ में आने वाली होली की तैयारी के लिए ढोलकिया भी सही करवाई जाती थी । फ़टाफ़ट काम निबटाकर और अपना नेग लेकर वो फिर निकल पड़ता क्योंकि ये एक ही दिन उसके लिए बहुत व्यस्तता वाला रहता था। 

ऐसे ही कभी बचपन मैं हमारे कान भी छिदवाये गए होंगे। मुझे बहुत अच्छे से तो याद नहीं पर इतना ध्यान है की गुड़ का बड़ा सा टुकड़ा खाने को दिया था आमा या आईजी ने और जब तक मुँह में रखा ही था और सुई -धागे से  कान  छिद  गए थे।  बड़े दिन तक धागा ही रहा कान में और फिर उसके बाद तुलसी की लकड़ी और  कई महीनो बाद छोटी छोटी बालियाँ  पहनी थी।

 अब तो शायद ही ऐसे घर में कान छिदवाये जातें हैं पर बसंत पंचमी के दिन और इस दिन का आज भी पहाड़ में उतना ही महत्व है। पहाड़ में बसंत पंचमी के कई दिन पहले दुकानें  पीले रंग के रुमालों  से सज जाती हैं।  जब हम छोटे थे तो  घरों में  घर पर ही पीले कपडे से सबके लिए रुमाल सिले जाते या कभी सफ़ेद रूमालों  को पीले रंग से घर पर ही रंगा जाता था । सिर्फ परिवार के सदस्यों के लिए ही नहीं  आस पड़ोस के भी सभी परिवारों के लिए रुमाल बनते थे।  हर त्यौहार की तरह, बसंत पंचमी का त्योहार घर में ले के आता था , सुबह सुबह रसोई से पकवानों की खुशबु , पीले रूमालों से ढककर  पड़ोस में प्रसाद देने जाते बच्चों की चहल पहल जिनके कान पर ज्यों के पत्ते रखे होते और लगभग सभी बच्चे कुछ न कुछ पीला जरूर पहनते ।

ज्यों की फसल पहाड़ में इस समय पहली  फसल होती है तो उसके पत्ते सर पर  रखकर सभी ईश्वर से प्राथना करते  हैं की सभी के जीवन में बसंत ऋतू की तरह ही खुशहाली और  समृद्धि बनी रहे। 

बसंत का स्वागत करती प्यारी सी तनुषा और प्रीशिता

बसंत पंचमी के दिन ही बैठकी होली की भी  शरुआत हो जाती है तो आज ऋतुराज बसंत पर लिखी गई एक सुन्दर होली के साथ आप सभी तो बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें।

आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहायो , सखी ऋतुराज कहायो-२ 

पुष्प-कली  सब फूलन लागे, फूलन लागे , फूल ही फूल सुहायो

ऐसी मोरियालि फूल ही फूल सुहायो,  

कामिनी ,केसर , मंजरी  फूले-२ 

 उन बिच श्याम सुहायो, सखी ऋतुराज कहायो।

आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहायो , सखी ऋतुराज कहायो

वन -पंछी  वन बोलन लागे-२ 

 बोल ही बोल सुहायो 

ऐसी मोरियालि बोल ही बोल सुहायो। 

पिया-पिया बन रटत पपीहा , पिया बिन कुछ न सुहायो , सखी ऋतुराज कहायो।

आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहायो , सखी ऋतुराज कहायो।

इत  से आयी नवल राधिका -२ 

उत  से कुंवर कन्हाई ,ऐसी मोरियालि उत से कुंवर कन्हाई, 

मिल -मिल फाग बरस भर खेलें , शोभा बरनी न जाई – सखी ऋतुराज कहायो ,

आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहायो , सखी ऋतुराज कहायो

दिया और बाती 

इस दिसंबर आमा को गए तीन साल पूरे हो गए पर आज भी कई रूपों में हमेशा आस पास ही रहती है।

आमा कभी भी खाली नहीं बैठती थी। रसोई निबटा के जब धूप मैं बैठने आती तो हाथ में या तो बुनाई के लिए ऊन होता या फिर आसन काढ़ने के लिए सुई।  एक दो किताबें भी होती आमा की पोटली में और हाथ थक जाता तो आमा  उनको पड़ती रहती।  पर इस सब से ज्यादा जिस काम में आमा लगी रहती, वो था पूजा के लिए बत्ती  बनाना।   

रोज सुबह पूजा करते सा समय जब भी दिए में बत्ती लगाती हूँ तो  याद आ जाता है  राख से भरा वो छोटा सा कटोरा जिससे आमा अपनी उंगुलियों पर राख मलती और बड़ी ही निपुणता से अपनी उँगलियों से  रुई बंट  के बाती  बनाती जाती।

छोटे थे तो बड़ा आसान लगता था फिर जब कोशिश करते तो जरा सी रुई भी न बँट पाती और आमा की बनायीं बत्तियों के बण्डल देख के  बड़ा आश्चर्य होता था कि कैसे  फटाफट आमा इतनी ढेर बत्तियां बना लेती है। 

 कई लोग आमा के लिए रुई ले के आते और आमा  उनके घर में होने वाले शादी-ब्याह ,पार्थिक पूजा या सत्यनारायण कथा के लिए बत्ती बना के रखती। तुरंत भी चाहिए होती तो आमा के संदूक से जरुरत के अनुसार सबके लिए बत्तियां जरूर मिल जाती। तीन तार वाली(त्रिपुरी),  पांच तार वाली (पंचपुरी) या  सात तार वाली (सतपुरी),१०८  बत्तियों का एक बंडल और बंडलों से भरी पोटली हमेशा  सभी के पूजा पाठ में काम आती। 

जब मैं पढाई के लिए पहले बार हॉस्टल गयी तो आमा  मेरे लिए एक छोटी सी देवी की तस्वीर और दिया ले आयी थी और साथ में एक डब्बे में घी में भीगी बत्तियां हिसाब से रख दी थी कि दिवाली की छुट्टी तक कम न पड़ें। अपने हाथों बने आम, मिर्ची के अचार के साथ हर बार घर से जाते वक़्त कभी बत्तियां रखना नहीं भूलती थी आमा। 

उम्र के साथ आमा के हाथ थकने लगे पर फिर भी धीरे-धीरे आमा हमेशा काम में लगी रहती।  मुझे याद है जब आरोही के होने पर आमा और आईजी  मुझे मिलने गुड़गांव आये तब आमा की याददाश्त काफी कम हो गयी थी और तबियत भी अक्सर खराब रहती। आमा को  पता नहीं कहाँ से मेरे कमरे में रुई मिल गयी और वो तब भी   बतियाँ बनाने लगी। लगभग १० बत्तियों का वो बण्डल मैंने आरोही के  बचपन के सामान के साथ संभाल के रख लिया। शायद ये आखिरी बत्तियां थी जो आमा ने बनायी। 

अब छुट्टियों में घर से लौटते समय वो बत्तियों का डब्बा तो नहीं  होता पर कई  सारी  चीजों की तरह आमा ने पता नहीं कब बत्ती बनाना भी सिखा दिया था। अब बत्ती खुद ही बनाती हूँ  और  जब भी दिया जलाती  हूँ तो आमा बस आस-पास ही महसूस होती है, कभी श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी  जपते हुए, तो कभी ये लोकगीत गाते हुए जो वो अक्सर शाम को दिया बत्ती करते हुए गुनगुनाया करती  थी। 

सांझ पड़ी सँझ वाली पाया चलिन रैना।

आस-पास मोतियों  हार, बीच चलिन गंगा। 

लक्ष्मी पूछिन छिन,  स्वामी अपने नारायण।

जागहुँ दीयड़ा सुलछीनी रात्रि। 

अगर चन्दन को दीयो जलायो, कापुर सारी बाती,

घरि-घरि दीपक जलायो , घरि-घरि आनन्द बधायो।।

रमिचन्द्र घरी, लछिमन घरी,साँझ को दीयो  जलायो।

सीता देहि, बहुरानी जनम अवान्ति।

इन भवन की शोभा न कोई। 

सांझ पड़ी सँझ वाली पाया चलिन रैना। 

आस पास मोतियोँ  हार, बीच चलिन गंगा। 

झाड़ – झुगौड़

हमारी आमा ( गुडगांव-२०१४)

लगभग अठारह महीने से सब घर पर हैं। जीवन चलता रहता है और हम भी स्वयं को जरूरत के हिसाब से ढाल लेते हैं। पिछले अठारह महीने से घर  का माहौल ही अलग है।छोटा सा  घर जरूरत के अनुसार स्कूल, ऑफिस, शॉपिंग मॉल, पिक्चर हॉल, पार्क सब रूप ले लेता है। 

सब घर पर हैं, पर सभी व्यस्त हैं। सबने घर पर ही अपना रूटीन बना लिया है और चाहे ऑफिस का काम हो या पढ़ाई-लिखाई सभी उसी तरह चल रही है जैसे पहले चलती थी। हाँ ! पर कुछ  काम हैं  जो इतना बढ़ गए है कि कभी-कभी बड़ा गुस्सा आता है। 

और ऐसा ही एक काम है घर की सफाई। कितना भी साफ करो थोड़ी ही देर में घर ऐसा लगने लगता है जैसे किसी ने सफाई की तरफ ध्यान ही न दिया हो और  चारों ओर फैले कूड़े को देखकर आजकल मुझे हमारी आमा की बड़ी याद आती है।

 जब हम छोटे थे तो आंगन में, रसोई में या बैठक में कुछ न कुछ साफ करती आमा अक्सर कहा करती थी।

“चेला ! झाड़ भय , झुगौड़ भय आफि हैं जा। “

( कूड़ा और झगड़ा अपने आप हो जाता है, कोई करता नहीं  )

बचपन में आमा की इस बात पे हम तुरंत आमा से कहते कि बिना करे कुछ नहीं होता और आमा कहती-

 “ जब म्यर उमर में आला पोथी, तब तुमनको समझल” 

( बच्चों ! जब मेरे बराबर हो जाओगे तब समझोगे कि  मैं क्या कह रही हूँ )

आज जब भी घर की सफाई करती हूँ तो आमा की छोटी सी बात में छिपा गहरा अर्थ समझ आता है।  क्योंकि देखती हूँ की सच मैं कोई भी जान के गन्दगी नहीं फ़ैलाता। बच्चे  तो बस पढाई करते हैं या फिर खेलते रहते हैं, और बड़े अपने काम में लगे रहते हैं।  कूड़ा तो बस एक बाइप्राडक्ट( उपफल) है जो वास्तव मैं अपने आप ही हो जाता है। 

फिर ध्यान जाता है आमा की बात में छिपे दूसरे शब्द पर – झगड़ा। पिछले दिनों में कई बार सोचा है इस शब्द पर और हर बार एक ही निष्कर्ष पे पहुँचती हूँ कि  झगड़ा भी एक उपफल ही तो है।  

हर इंसान का / हर रिश्ते का अपना एक दृष्टिकोण होता है और वह दूसरे इंसान से / दूसरे रिश्ते के दृष्टिकोण से  मेल न  बैठा पाए उसका उपफल – झगड़ा। एक इंसान की इच्छाएँ जब दूसरे को स्वार्थ लगने लगें , क्योंकि दूसरा भी वही इच्छा रखता है तो उपफल- झगड़ा। एक रिश्ते की दूसरे रिश्ते से अपेक्षाएं अगर दूसरा रिश्ता न पूरी कर पाए तो उपफल- झगड़ा। 

सच ही तो है ,  शायद ही कोई इंसान हो जो गंदगी फैलाना चाहता है।  और ऐसे ही शायद ही कोई इंसान होगा जो  झगड़ा करना चाहता हो।  जैसे सब अपना काम करते रहते हैं वैसे ही सब अपना जीवन अपने हिसाब से जीते रहते हैं पर कहीं न कहीं कभी-कभी जाने -अनजाने  एक इंसान का सही दूसरे का गलत बन जाता है और अपने-आप हो जाता है झगड़ा। 

सफाई करए वक़्त तो मैं आमा की बात याद कर खुद को समझा लेती हूँ पर  कभी झगड़े  की परिस्थिति मैं  खुद को इस तरह समझा पाऊँगी यह अभी पुरे विश्वास के साथ कह नहीं सकती।😀

पर हाँ! कोशिश पूरी रहेगी। 

घी त्यार

आज घी संक्रान्ति है और पहाड़ के हर घर में, या यूँ कहूँ हर पहाड़ी के घर में, चाहे आज वो पहाड़ से कितनी ही दूर हो, एक विशेष पकवान जरूर बनेगा। और ये पकवान है गरमा-गर्म, खूब सारे घी में डूबी बेडुआ रोटी।

    डाइटिंग पे हो???? कोई बात नहीं ,आज तो घी खाना ही पड़ेगा वरना अगले जनम में गनेल ( Snail ) बन के  पैदा होगे।  इस मान्यता का कोई प्रमाण  तो मेरे पास नहीं है, पर हाँ!  बचपन से ये बात सुनती आयी हूँ, और  जब छोटी थी तो बरसात  में  खेतों के किनारे और आँगन में  निकलते  गनेलों को देखकर कभी कभी ये भी सोचा है कि “ क्यों  इसने पिछले जनम में इतनी स्वादिष्ट घी चुपड़ी बेड़वा रोटी खाने से मन किया होगा?”  अब बचपन की मासूमियत पे हंसी भी आती है और मासूम बचपन पे प्यार भी आता है। 

बब्बा ( मेरे पापा )  ने  सुबह-सुबह  घी संक्रांति  की बधाई दी तो आज  फिर वो पुराने दिन याद आ गए.  मेरी आमा हमेशा हाथ से रोटी बनाती थी।  बिना चकला बेलन का प्रयोग किये। सिल में पिसे  मॉस ( उड़द  दाल ) और फिर  आमा के हाथ से बनी बेडुआ रोटी। इस जोड़ी का कोई और मेल नहीं। उस पर से  हमारी गाय चनुली  के दूध से घर पर  बना घी।  कोई शब्द ही नहीं हैं मेरे पास उस स्वाद  को  बयां  करने के लिए।  

थोड़े बड़े हुए तो आईजी (माँ ) को जिम्मेदारी मिली रसोई की। आईजी  बेडुआ के साथ में मॉस और मूंग की दाल मिला कर कचौड़ी भी बनाती जो आमा को  भी बहुत पसंद आती थी। 

बब्बा  का मैसेज मिलते ही वो रोटी और कचौड़ी  का स्वाद जैसे  ताज़ा हो आया और आज मैंने भी बच्चों क लिए बेडुआ रोटी बनाने की कोशिश की । सिल तो मेरे पास नहीं है तो मिक्सी में  ही सही, पर आज के दिन बेडुआ और घी  खाना तो बनता है। अपने छोटे से बगीचे से  रायते के लिए ककड़ी, धनिया और हरी मिर्च तोड़ते हुए वही बचपन के दिन याद आ गए जब सलगभग सारी  सब्जियां घर पे अपने खेत से ही आती थी। 

बच्चों को बेडुआ  रोटी का नाश्ता अच्छा तो  लगा पर साथ में सवाल भी आ गया, और सवाल भी बड़ा अनोखा कि  “मम्मा  अगर घी नहीं खाएंगे तो कुछ और क्यों नहीं  गनेल  ही क्यूँ ?”  मैं  सोचने लगी की काश ये सवाल मैंने बचपन में पुछा होता तो शायद मुझे आज इस मान्यता के पीछे की कहानी पता होती। 

 थोड़ा सोचकर मैंने बच्चों को समझा दिया कि सावन की बरसात के बाद जब भादों का महीना शुरू होता है तो मौसम भी बदलता है और अपने साथ सर्दी जुखाम जैसी कई बिमारियां भी ले के आता है। घर का बना शुद्ध  घी शरीर को बीमारियों से लड़ने के लिए  प्रतिरोधक बनाने में मदत करता है। शायद इसीलिए इस समय घी खाने पे जोर दिया जाता होगा और जो बच्चे  घी खाने से मना  करते होंगे उन्हें आँगन में रेंगते आलसी और कमजोर/डरपोक    दिखने वाले गनेल ( जो  इस मौसम में अकसर  दिखायी  देते हैं ) दिखा कर समझाया जाता होगा कि- “ घी खा लो वरना  गनेल जैसे आलसी और कमजोर हो जाओगे और अगले जन्म  में भी गनेल ही बनोगे।”

बच्चों ने मेरी बात पे कितना यकीन किया ये तो नहीं पता पर इस मान्यता की शुरुआत कैसे हुयी ये जानने की इच्छा मेरे मन में भी उठी है।  अगर आपको पता हो तो कृपया मुझे भी बतायिएगा।

जी रया, जागी रया, 

यो दिन, यो बार भेटन  रया। 

हिमाल में ह्युं  छन  तक, 

गंगा ज्यु  में पाणी  छन तक,

यो दिन और यो मास भेटन  रया।  

इसी प्रार्थना के साथ आप सभी को घी संक्रान्ति की शुभकामनाएं।

माँ….


आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिख रही हूँ। पिछले कुछ समय से सभी तरफ परिस्थिती ही कुछ ऐसी है कि लिखने का ना तो मन हुआ और ना ही मौका मिला , पर आज Mothers Day के अवसर पर मन किया कि कुछ ऐसा लिखूं जिससे मन में सकारात्मक विचार आयें। माँ शब्द है ही एक सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ। मन चाहे कितना भी परेशान हो, माँ के आँचल में हमेशा सुकून पाता है।

कोरोना महामारी के चलते मुझे आईजी (मेरी माँ ) के पास गए आज दो साल चार महीने से ज्यादा समय हो गया है।
कभी-कभी मन करता है उसके पास चुपचाप से बैठने का ,गोद में सर रखके, प्यार भरी थपकी संग सोने का। मन उदास भी होता है , पर फ़ोन पर उसकी एक आवाज से सारी उदासी दूर हो जाती है। यही तो जादू होता है माँ का। मीलों दूर से भी वो जाने -अनजाने सारी परेशानी दूर कर सकती है।
आईजी, बचपन में समझ नहीं आता था पर आज खुद माँ बनने के बाद आपको और अच्छे से समझ पायी हूँ। आज चाहे दूर हूँ पर आपकी परछाई हूँ और मन से हमेशा आपके आस-पास हूँ।

माँ तो एक ही होती है, पर मेरे जीवन में कुछ और रिश्ते हैं जिनका नाम कहने को अलग है पर अगर जिक्र आये तो सबसे पहले उनकी ममता ही महसूस होती है ।

मेरी आमा। आमा आज इस दुनिया मैं नहीं पर उसका प्यार और उसकी समय समय पर दी सीख ने हम बच्चों के व्यक्तितव की नीव रखी। आमा, आप चले गए पर पर आज भी कोई दिन नहीं होता जब आपका ख्याल न आता हो। आमा मेरे मन का वो प्यारा सा टुकड़ा है जो हर- पल, हर परिस्थिती में मेरा मार्गदर्शन करता है।

दूसरी, मेरी सबसे बड़ी बुआ । ऊपर से थोड़ी सख्त दिखने वाली पर अंदर से उतने ही प्यार और ममता से भरी मुन्ना बुआ। प्यार तो सभी बुआओँ से बहुत मिला है, पर मुन्ना बुआ की बात कुछ और ही है। छोटी बड़ी कितनी ही चीजें सिखाई हैं बुआ ने। गलती पे डाँठा भी है और सारी फरमाइशें भी हमेशा पूरी की हैं। बुआ आपसे अब फ़ोन पे भी कम बात कर पाती हूँ पर जब भी कुछ काम करती हूँ तो कैसे आपने सिखाया था वो बचपन की यादें हमेशा मेरे साथ रहती हैं।

दो और नाम हैं जिनके बिना ये लेख पूरा नहीं हो पाएगा । मेरे हॉस्टल के वार्डन आशा मैम और औरंगाबाद में मेरी साथी मोनिका दी।

आशा मैम, घर से दूर पंतनगर में पहली बार आपसे मिली। कोई रिश्ता नहीं था, पर तीन साल में आपने जो स्नेह दिया है, वो हमेशा मेरे साथ है।

मोनिका दी, आप ने औरंगाबाद में मुझे एक नया परिवार दिया। मुझे याद ही नहीं कैसे आप मेरी सबसे अच्छी सहेली बन गयी। जब भी जरुरत थी आपने एक माँ की ही तरह मेरा ध्यान रखा है। आपके साथ बिताया हर दिन और आपका बनाया स्वादिष्ट खाना, बहुत याद आता है दी।

और अब वो दो प्यारे से नटखट जिन्होंने मुझे माँ बनाया । मेरी दो प्यारी सी बेटियां जो मेरे जीवन के हर पल को खास बनाती हैं । आरोही की आज के लिए खास बनायी ये तस्वीर और श्रीजिता की दीदी के साथ मम्मा के लिए दोहराई कविता की दो पंक्तियों के साथ आप सभी को Mothers Day की बहुत शुभकामनाएं ।

सबसे प्यारा बोल है माँ, दुनियां में अनमोल है माँ।”

यादें जन्मदिन की…..

माता -पिता का जीवन अपनी संतान की परिधि पे ही घूमता रहता है।  जब बच्चे छोटे हों तो हम उनके बचपन की यादों को सिर्फ सहेजते ही नहीं बल्कि उनके बचपन के साथ अपने बचपन को फिर से जीते भी रहते हैं।

मेरी छोटी बेटी श्रीजिता का जन्मदिन आने वाला  है।  तीन साल की होने वाली छोटी सी मेरी बेटी दो दिन  पहले मेरे पास अपनी फरमाइश ले कर आयी – “मम्मा मेरे लिए केक में खूब सारा चॉकलेट सिरप डाल  देना और  स्प्रिंक्ल के साथ खूब सारी  स्ट्रॉ बेरी और चेरी भी लगा देना”।

उसकी इस फरमाइश पे मैं मुस्कुरायी तो पास  बैठी मेरी बड़ी बेटी बोली “ मम्मा जब  आप छोटे थे तो नानी कौन सा केक  बनाती  थी ?”

उसका ये सवाल मुझे जैसे उड़ा  के ले गया मेरे बचपन  में जब साल भर में ये दिन खास तो होता था पर इस दिन को मनाने का तरीका  कुछ और ही था।

आप केक नहीं काटते थे तो फिर बर्थडे कैसे सेलिब्रेट करते थे ? बड़ी मासूमियत से उसने पूछा तो मैं मुस्कुराते हुए उसे अपनी  गोद में बिठा के  बोली की चलो आज बताती हूँ जब मैं आपकी उम्र की थी तब कैसे मनाया जाता था जन्मदिन। 

जब हम छोटे थे तो जन्मदिन की तैयारी उस दिन शुरू  होती जब नए कपड़े ख़रीदे जाते।  दीवाली के बाद यही मौका था जब नए कपड़े बनते थे।  फिर इंतज़ार रहता जब आईजी बाजार से  टॉफ़ी का पैकेट ले के आती और बस हो गयी खरीदारी  जन्मदिन की। 

जन्म बार  के एक दिन पहले आईजी देती ऐपन।  लाल गेरू के ऊपर सफ़ेद बिस्वार से  रसोई के सामने ही स्न्नान चौकी बनती। रात को आमा कहती  आज जल्दी सो जा कल जन्म बार  है जल्दी उठना है और हम सुबह  उठते  आमा की रसोई से आने वाली पुए  और बड़े की खुशबु के साथ।  सुबह ९:३० से स्कूल शुरू होता इसलिए आमा और आईजी न जाने कब उठ के सारी  तैयारी कर लेते। छोटी थी तो मुझे  खाने में मीठे के अलावा सिर्फ झोली-भात पसंद तो सभी पकवानों के साथ वो भी बना लेती आमा मेरे लिए। 

      सबसे पहले रसोई  के सामने बनी चौकी के ऊपर परात पर बैठा कर  पीली सरसों और हल्दी का उबटन लगाया जाता।  आईजी रंग-वाली से छांव करती और आमा गाती शकुनाखर। नहाने के बाद नए कपड़े पहनने को मिलते। फिर पहले मंदिर में आबू के साथ बैठ कर  पूजा करनी होती जहाँ पूजा पे कम मंदिर में रखे प्रसाद से आने वाली खुशबु पे ज्यादा ध्यान जाता। सबके पैर  छू के मिलता खूब सारा आशीर्वाद और फिर खाने को मिलता प्रसाद। 

जन्मदिन पर स्कूल जाने का भी  अलग ही मजा था। उस दिन स्कूल यूनिफार्म से छुट्टी जो मिलती थी और सारा दिन अपने नए कपड़े पहन के इतराने में बड़ा  मजा आता । उस दिन बालों की दो चोटियां  बनानी जरूरी नहीं थी। उस दिन तो बाल खोलने की भी आज़ादी थी।  

क्लॉस के सारे बच्चे मिल के हैप्पी बर्थडे गाते और फिर  सब बच्चों में टॉफ़ी बांटते हुए सबसे जन्मदिन की शुभकामनाएं मिलती।  फिर अपनी सबसे अच्छी दोस्त को साथ लेके  सभी  टीचर्स को टॉफ़ी बांटने के बहाने स्कूल  में घूमते घूमते एक -दो टॉफी खुद  भी खा लेते आखिर बर्थडे तो आपका ही है। 

तो क्या आप के बर्थडे में पार्टी नहीं होती थी ? मेरी बेटी बड़ी उत्सुकता से बोली। 

बेटा  पार्टी तो होती थी पर पार्टी का ढंग थोड़ा  अलग था।  तब पार्टी के लिए  न तो  इनविटेशन  पहले से भेजे जाते और न ही  RSVP। शाम को आंगन में रोज की तरह सब बच्चे खेलने को जुटते और वहीं  पर हो जाती पार्टी। कोई बच्चा उस दिन खेलने आया नहीं तो  उसे वहीँ आँगन से आवाज लगा के बुला लेते. आबू ले के आते समोसे और जलेबी और घर में बनते छोले भटूरे और सबसे खास  जन्म बार पे बनने वाली खीर। बस यही खाते  खेलते हो जाती पार्टी। 

मेरी बेटी को जन्मदिन मनाने का ये तरीका पसंद आया या नहीं यह तो उसने नहीं बताया पर मुझे मेरे बचपन का सफर कराकर मुस्क़ुराती वो फिर से जुट गयी अपनी छोटी बहन के जन्मदिन की तैयारी में।

नयी आस…

मेरे मामाजी ( स्वर्गीय बंशीधर पाठक “जिज्ञासु” ) से मिलने का सौभाग्य मुझे बस एक ही बार मिला । तब मैं बहुत छोटी तो नहीं थी पर इतनी बड़ी भी नहीं थी कि उनसे ज्यादा बात कर पाती। मामाजी लेखक हैं ये तो मुझे पता था पर उनकी कोई भी रचना कभी पढ़ी नही थी। उस दिन मामाजी जाते समय माँ को अपनी कुछ नयी किताबें दे गए थे और तब मैंने उन किताबों में प्रकाशित उनकी रचनाएँ पढ़ी। उनके लिखे एक गीत की पहली पंक्ति मुझे अक्सर याद आती है “नया प्रातः आया, नयी आस लेकर”।

लड़कपन के उन दिनों में,मामाजी से प्रेरित होकर और उनकी रचनाओं को पढ़कर मुझमें भी लिखने का शौक जगा। कई छोटी-बड़ी कविता, कहानियाँ लिखने की कोशिश भी की पर पढ़ाई के साथ कभी खुल कर ये शौक पूरा नही हो पाया।

आज नव-वर्ष की पहली सुबह मुझे फिर वही पंक्तियाँ याद आ गयी। मामाजी की दी किताब तो अल्मोड़ा में घर मे किसी संदूक में सम्भली है और पूरा गीत याद नहीं आया तो एक छोटी सी कोशिश करने का मन हुआ।

नव-वर्ष आप सब के जीवन में नयी उम्मीदें एवं नयी खुशियां ले के आये। आप सभी तन एवं मन से स्वस्थ्य एवं निरोगी रहें। नये साल पर नयी आशा के साथ एक छोटी सी रचना आप सब के लिये …

मॉं नंदा , दैणी है जाये।।

पहाडों की गोद में बचपन बीता हो और नंदा देवी के मेले से जुड़ी  यादें न  समेटी हों!  ये मुश्किल है।

        यूँ तो कई साल हो गए अल्मोड़ा में  लगने वाले नंदा देवी के मेले का आनंद लिए हुये पर आज भी मेले की तिथी आते ही कानों में जैसे वो फूंक मारकर बजने वाले बाजे की आवाज गूँजने लगती है। सुनाई देने लगता है छोलिया का बैंड और याद आते है वो कई हफ़्तों पहले से लग जाने वाले झूले जिन्हें मोटर से नही पैरों से चलाते थे झूले वाले। जब सबसे बड़ा झूला लग जाता तो वो हमारे आंगन से भी दिखाई देता और फिर  बेचैनी से इंतज़ार रहता मेले के शुरू होने का।

मेला तो पांच दिन चलता पर सब घर वाले अष्टमी को ही ले जाते थे हम बच्चों को मेला दिखाने के लिए,जब स्कूल की छुट्टी होती और देवी का डोला भी तैयार होता। गर्मी की छुट्टियों में बुआ जो पैसे दे जाती उसे ख़र्च करने का भी तो यही एक मौका मिलता हम बच्चों को। हर साल लंबी लिस्ट बनाते मैं और भारती। एक बार बड़ी बहस हुई की गुड़िया के  बर्तन  लिए जाएं जिनके साथ सिलेंडर और चूल्हा भी मिलता था या आंख बंद करने वाली गुड़िया। तरह तरह के बाजे, चाबी से चलने वाला लट्टू और इलास्टिक से बंधा गुब्बारा जिसे घर तक बड़ा सहेज के लाया जाता ये सब तो मेले की शॉपिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।अल्मोड़ा में लगने वाला यही एक ही मेला तो था और  साल में बस एक बार ही लगता था|

बचपन के वो दिन भी अनमोल थे, छोटे थे , बस खेल कूद में मस्त रहते थे हम। ऐसे ही एक बार मेले की छुट्टी की  कई  योजनाएं बन रही थी क्लास में, शोर मचा और टीचर को गुस्सा आ गया।  मिस के पंत, बहुत स्ट्रिक्ट टीचर थी और सामाजिक विज्ञान की क्लास थी। बस फिर क्या था, एक एक कर सबसे पूछा उन्होंने की बताओ ये नंदा -सुनंदा हैं कौन ?और क्यों नंदादेवी का मेला लगता है?

आज जब भी मैं मेरी बेटी को कुछ बताती हुँ तो उसके कई प्रश्न होते हैं पर आजकल जैसे बच्चे तो हम थे नहीं ,जो हर बात पे पहले उसके पीछे छुपी कहानी पूछते सो शायद कोई भी नही बता पाया मेला क्यों लगता है । उस दिन सब बच्चों को गृह-कार्य मिला नंदादेवी की कहानी लिख के लाने का और शाम को फिर आमा ने सुनाई कहानी नंदादेवी की।

नंदा देवी कुमाऊँ के चंद राजा की बेटी थी और सुनंदा उसकी छोटी बहन। जब रोहिंग्या राजकुमार ने नंदा से विवाह करना चाहा तो राजा ने मना कर दिया ।दोनों राजाओं के बीच तब भयंकर युद्ध हुआ। अपनी जान बचाने के लिए नंदा अपनी बहन के साथ हिमालय की चोटी पर चढ़ गई और उसी में समा गई। तभी से उस चोटी का नाम नंदा देवी और उसके पश्चिम में स्थित चोटी का नाम सुनंदा पड़ गया और  दोनों बहनों को दुर्गा का अवतार मानकर पूजा जाने लगा।नंदा देवी को शक्ति की देवी के रूप में पूजा जाता है और पूरे उत्तराखंड में कई जगह देवी के  मंदिर स्थापित हैं।  अल्मोड़ा में नंदादेवी  का भव्य मंदिर है और प्रतिवर्ष भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को नंदाष्टमी का पर्व एवं मेला देवी के सम्मान में धूमधाम से मनाया जाता है। चंद राजा के वंशजो की उपस्थिति में देवी का डोला सजाया जाता है, विधि विधान से पूजा जाता है और मेले के अंतिम दिन पहाड़ की बेटियों के डोले को विदाई दी जाती है।

स्कूल खत्म हुआ और  पढ़ाई के लिए अल्मोड़ा से बाहर चले गए तो जीवन में हर साल जुड़ने वाले अनमोल लम्हे भी पीछे छूटते चले गए। पहले पढ़ाई फिर नौकरी और फिर परिवार में मौका ही नहीं मिला मेले में अल्मोड़ा आने का और देवी का डोला देखने का।

फिर एक साल, नंदाष्टमी का दिन मेरे लिए सबसे अनमोल बन गया जब आज से सात साल पहले माँ नंदा ने मुझे एक प्यारी सी बिटिया की माँ बनने का सौभाग्य प्रदान किया। बचपन में जिस दिन का बेसब्री से इन्तेजार मुझे रहता था आज भी वैसे ही रहता है। आज मेले में जाना नही हो पाता पर बेटी के जन्मदिन की ख़ुशी से घर मे ही मेला लग जाता है। उसकी हंसी, उसकी बातें घर में मेले सी  ही रौनक बनाये रखती हैं ।

आरोही (एक वर्ष)
आरोही (सात वर्ष)

नंदाष्टमी पे अब फिर अल्मोड़ा जाना कब हो पाए ये कहना मुश्किल है पर  बड़ी होती बेटी के साथ अपने बचपन की यादें साझा करने का आंनद मुझे हमेशा मिलता है। और इस बार हम मां बेटी ने मिलके बनाई डोले की यह तस्वीर। 

माँ नंदा-सुनंदा के डोले की तस्वीर बनाने का एक प्रयत्न।

नंदाष्टमी के पावन पर्व पर यही प्रार्थना है कि नवदुर्गा का अवतार माँ नंदा एवं माँ सुनंदा हम सब पर सदा प्रसन्न रहें और अपना आशिर्वाद सभी पर बनाये रखें।

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