
दिसंबर का महीना और बहार का तापमान -२५ डिग्री,पर आरोही की सहेली का जन्मदिन है तो घर से तो निकलना पड़ेगा, ऐसे मैं मुझे याद आया एक अनमोल तोहफा और फिर हम सब ने पहने प्यार की गर्माहट लिए आईजी के हाथों बिने स्वेटर।
पुरे बचपन और लड़कपन की सर्दियाँ इन्ही हाथों से बने स्वेटरों में बीती हैं पर आज न जाने क्यों बच्चों को स्वेटर पहनाते हुए जो महसूस हुआ वो पहले कभी नहीं हुआ। शायद ये उम्र का असर है और समय आपने साथ साथ हमे उन सब चीजों की क़द्र करना सिखा ही देता है जिनकी अहमियत हम समझ नहीं पाते। बच्चे सुन्दर स्वेटर पहन के बड़ा खुश थे और जैसे ही मैंने स्वेटर पहना तो आज न जाने क्यों मन भर आया।
आज पहली बार समझ समझ आया की ये गर्माहट सिर्फ ऊन की नहीं बल्कि ये गर्माहट है प्यार की जो एक-एक फंदे के साथ बिना है आईजी ने इस स्वेटर में। ये गर्माहट है सर्दी की उन दोपहरों की जब धूप सेकते हुए एक-एक पल्ला पूरा किया होगा। ये गर्माहट है उस स्नेह की जब हर बार आईजी ने हमारी नाप लेने के लिए मुझे और बच्चों को अपने मन की नाप में मापा होगा। हिचकी तो जरूर आयी होगी तब हमें पर क्यों कोई याद कर रहा है ये समझ न आया होगा।


सर्दी की वो दोपहरें भी क्या ख़ास थी जब चूल्हा चौका करके, पास पड़ोस के सभी लोग साथ में आँगन में धूप सेकते। नीला साफ आसमान और सर्दियों की चटख धूप में बैठे इधर- उधर की बातें करती आमा, आईजी, ताईजी बुआ और चाची न जाने कितनी नयी नयी बिनाईंयां एक दूसरे को सिखाती और ऊन के रंग बिरंगे गोलों से रिश्तों में नयी गर्माहट बुनती जाती।
सभी बुनाई में निपुण तो थी पर हर एक की अलग विशेषज्ञता भी थी। सभी के अपने खास डिज़ाइन होते और किसी के हाथ की सफाई इतनी सुन्दर की पुरे मोहल्ले में किसी का भी स्वेटर हो सभी में गाला बिनने की जिम्मेदारी उन्ही की होती।
सिर्फ स्वेटर ही नहीं , तरह तरह की टोपी, कनछुप्पा मोज़े, दस्ताने सभी इन निपुण हाथों से ही बनते और पूरी सर्दियाँ हमें गर्म रखते।

हम बच्चों को पहले लच्छी से गोले बनाने का काम मिलता या फिर कभी-कभी पुरानी स्वेटर उधाड़ने का। थोड़े बड़े हुए तो गर्मी की दोपहरों सबके लिए चाय बनाने की जिम्मेदारी भी मिलने लगी और इसी बीच न जाने कब सब ने मिल के हम बच्चों को भी फंदे डालना और तरह-तरह की बिनाइयाँ भी सिखायी। कभी नीम्बू सानने के लिए भांग भूनते तो कभी खट्टे मीठे माल्टों का मजा लेते हुए होम साइंस की फाइल के लिए हर एक नए डिज़ाइन के छोटे छोटे नमूने इकट्ठे किये हैं जाड़ों की उन यादगार दोपहरों में।


बचपन में सीखी इस कला को भूलना मुश्किल है। आरोही के लिए मैंने भी कुछ स्वेटर बुने। कुछ सही बने और कुछ नहीं पर आरोही के बाद श्रीजीता को भी पहनाये। बच्चों के लिए उनकी दादी, नानी और बुआ हमेशा ही कुछ न कुछ बिन के रखती है और अच्छा लगता जब बच्चे भी हाथ के बने स्वेटर पहन के इतराते हैं। और इतरायें भी क्यों न , आख़िर ये गर्माहट तो अपनों के प्यार की है जो बड़े स्नेह से एक एक फंदे में बिनि गयी है।






























