जीवन में कितने लोग मिले और कई दोस्त बने।कुछ जान बूझ संग छोड़ गए,और कुछ मर्जी से संग रहे।कुछ थोड़ी देर तो साथ चले पर फिर जाने कैसे बिछड़ गए।कुछ साथ में तो चल न सके, पर कभी बिछड़े भी नही।खट्टी मीठी यादें भी बनी, चटपटे किस्से भी बनते गए।जीवन मे कितने लोग मिले औरपढ़ना जारी रखें “दोस्त, साथी, दगड़ी😍”
Category Archives: Uncategorized
रंग्वाली पिछौड़ा
अपनी बेटी के साथ न जाने कितनी बार अपने बचपन को फिर से जी लेती है माँ। आज मेरी बिटिया जब मेरी साड़ी लपेट के खेलने लगी तो मुझे फिर मेरे बचपन के वो दिन याद आ गए जब मैं भी आईजी या आमा की साड़ी पहन कर इतराती रहती थी। कोई त्यौहार आये तोपढ़ना जारी रखें “रंग्वाली पिछौड़ा”
आमा और आईजी की रसोई से: पुआ
पुआ … नाम लेते ही आंखों में एक चमक सी आ जाती है। याद आ जाती है अपने जन्मबार की वो सुबह जब आमा और आईजी की रसोई में बनते थे कई पकवान और सबसे पहले बनता था पुआ। बड़ी सी पीतल की वो परात जिसमे सुबह होने से पहले ही भिगो दी जाती सूजी,पकेपढ़ना जारी रखें “आमा और आईजी की रसोई से: पुआ”
लड़का एक खाता केक🎂
कुछ दिन पहले मेरी बेटी के स्कूल में Dr.Seuss का जन्मदिन मनाया गया। Dr.Seuss बच्चों के साहित्य में अपने काल्पनिक पात्रों और rhyming words (तुकांत शब्दों) के बड़े ही मनोरंजक उपयोग के लिए अत्यंत लोकप्रिय हैं। मेरी बेटियों और मुझे भी बहुत पसंद है उनकी लिखी Cat in The Hat और Green Eggs and Ham. पढ़ना जारी रखें “लड़का एक खाता केक🎂”
काले कौआ काले, घुघुति माला खाले।
यादों के समंदर से आज निकल के आया है एक ऐसा त्योहार जो वैसे तो पूरे भारत मे बड़ी धूम से मनाया जाता है पर पहाड़ में इसे मनाने का ढंग सबसे खास है। ये त्योहार है काले कौआ यानी घुघुतिया। माघ मास की संक्रांती को मनाया जाने वाला यह पर्व जिसे अन्य प्रदेशों मेंपढ़ना जारी रखें “काले कौआ काले, घुघुति माला खाले।”
*फूलदेई, छम्मा देई*
लगभग छः महीने पहले जब मैंने अपनी छोटी- छोटी पर अनमोल यादों को साझा करने का विचार किया तब जो शब्द सबसे पहले मन में आया उसी शब्द से जुड़े एक अनोखे त्योहार की यादों के साथ आज उस कड़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हूं। फूल देई जिसे फूल संक्रांत भी कहतेपढ़ना जारी रखें “*फूलदेई, छम्मा देई*”
देहली,आँगन और गौरैया…
मैं पहाड़ का एक हिस्सा हुं। यहीं पे मैं पैदा हुयी, यहीं खेली कूदी और बड़ी हुयी। यहीं पे सीखा मैने जीवन जीना ओर यहीं पर मेरा व्यक्तित्व विकसित हुआ। आज बचपन तो कहीं पीछे छूट गया पर कभी कभी अपने बच्चों का बचपन देखती अनायास ही मैं भी अपने बचपन में पहुंच जाती हूँ।पढ़ना जारी रखें “देहली,आँगन और गौरैया…”