जीवन में कितने लोग मिले और कई दोस्त बने।
कुछ जान बूझ संग छोड़ गए,और कुछ मर्जी से संग रहे।
कुछ थोड़ी देर तो साथ चले पर फिर जाने कैसे बिछड़ गए।
कुछ साथ में तो चल न सके, पर कभी बिछड़े भी नही।
खट्टी मीठी यादें भी बनी, चटपटे किस्से भी बनते गए।
जीवन मे कितने लोग मिले और कई दोस्त बने।
दोस्ती का जश्न मनाना हो तो कोई खास दिन की जरूरत नही होती पर कुछ खास मौके मिलें तो अपनों से अपने मन की बात जरूर कहनी चाहिए। आज जब friendship day का मौका मिला है तो मैं अपने उन सभी दोस्तों को जो मेरे जीवन का औऱ मेरी यादों का एक अभिन्न हिस्सा हैं , मेरे जीवन में आने के लिए शुक्रिया कहने का मौका छोड़ कैसे सकती हूं?
मेरी सबसे पहली दोस्त, मेरी बहन भारती जो बहुत जल्दी मेरा साथ छोड़ गई पर आज भी मेरे सबसे करीब है। मेरी आईजी और आमा जो मेरे सबसे बड़े मार्गदर्शक तो हैं, पर जिनमे मैंने हमेशा एक दोस्त पाया। मेरी चारों बुआएँ जो हम बच्चों की हमेशा हमजोली रही और आज भी दोस्त ही हैं। उर्मि दी, जिसके साथ गर्मी की छुट्टियों में सबसे ज्यादा मजे किये। जिसके साथ खेल खेल में कितनी चीजें सीखी और मैंने तो झगड़ा भी बहुत किया।
बचपन से ही मैं घर मे जितना हर वक्त बोलती रहती स्कूल में थोड़ा कम ही बोलती थी और मेरे दोस्त भी गिनती के थे। बचपन के उन साथियों भावना, नेहा, प्रियंका ,निधि और अपर्णा के साथ कई अनमोल यादें जुड़ी हैं मेरी जीवन की। बचपन के मेरे ये दोस्त आज भी मेरे जीवन का एक अनमोल हिस्सा हैं।
कोमिला और हिमानी से मेरी दोस्ती कॉलेज में हुई पर उनके साथ कॉलेज जाना,गुरुवार शाम को साईं मंदिर और फिर हमारे गेट पर घंटो बात करना जब तक आमा या आईजी की डाँठ न पड़े उसका मजा कुछ और ही था।
पंतनगर गयी तो पीयूष मैम, हिमांशु सर ,अंजना दी कविता मैम, सोनी मैम, प्रतिभा मैम जैसे सीनियर मिले जिनके पास अपनी छोटी बड़ी हर परेशानी लेके पहुंच जाती थी और जो एक पल में हल खोज लेते थे।
मेरी रूम मेट प्रिया के साथ हँसते हँसते पंतनगर के पांच साल कैसे निकले पता ही नही चला।
पंतनगर में ही मुझे ऐसी सहेली मिली जिसने मेरी बेटी के जीवन में मौसी की कमी नही होने दी। मेरी सबसे खास सहेली रश्मि। रश्मि के साथ में सिर्फ दो साल रही पर उसके साथ दिल का रिश्ता पहले दिन ही जैसे जुड़ गया था।
नीरजा, प्राची, मेघना, वैशाली, सुषमा, तृप्ति , बुशरा, हर्षल, शालिनी, जस्मिन इन्ही दोस्तों की वजह से घर से कई मील दूर औरंगाबाद में छै साल खुशी खुशी निकल गए।
औरंगाबाद ने ही मुझे मिलाया मेरी मोनिका दी से। सबसे अलग, थोड़ी गुस्से वाली पर अंदर से उतनी ही नरम। मोनिका दी में जैसे मुझे मेरा पूरा परिवार मिल गया औरंगाबाद में।
कई साल पहले मैंने दोस्ती पर एक कविता लिखी थी। आज मैं वही कविता अपने सभी दोस्तों को समर्पित करते हुए शुक्रिया कहना चाहती हुँ, मेरे जीवन मे आने के लिए और उसे अनमोल यादों से सजाने के लिए। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे दिल हमेशा ऐसे ही जुड़े रहेंगे।
को भै दगड़ी……
दगड़ी !!
दगड़ी जसि आलू गुटक दगड़ रैत।
दगड़ी जसि भिटौली में मैत।
दगड़ी जसि सिल और बाट्।
दगड़ी जसि चाखक पाट्।
दगड़ी जसि बड़ी मैं काकड़।
दगड़ी जसि शगुना आंखर।
दगड़ी भै नींबू में भांग जस।
दगड़ी भै ह्यूनक घाम जस ।
दगड़ी भै गहतक दाल मैं जम्बुक् धुँआर जस ।
दगड़ी भै पालक् तिनड़् दगड भुनी खुश्याण जस।
घरै छत मैं दगड़ी भै पटाल जस।
जीवन गीत मैं दगड़ी भै हुड़कीक् थाप जस।
जेठ मैं नौलक पाणि जसिक दे तराण उ भै दगड़ि।
हिसाउ किल्माैड़ि जसि मणि खटृ मणि मिठ् भै दगड़ि।
सिल पिसी लुण जसि चट्पट् भै दगड़ि।
चाहा दगड़ मिसरीक् टपकी भै दगड़ि।
रत्त् ब्याँणक् उजयाव ,ब्यावक दी-बात् भै दगड़ि।
आई के बतूं मि, म्यार लिजी को भै दगड़ि।









