दोस्त, साथी, दगड़ी😍

जीवन में कितने लोग मिले और कई दोस्त बने।
कुछ जान बूझ संग छोड़ गए,और कुछ मर्जी से संग रहे।
कुछ थोड़ी देर तो साथ चले पर फिर जाने कैसे बिछड़ गए।
कुछ साथ में तो चल न सके, पर कभी बिछड़े भी नही।
खट्टी मीठी यादें भी बनी, चटपटे किस्से भी बनते गए।
जीवन मे कितने लोग मिले और कई दोस्त बने।

दोस्ती का जश्न मनाना हो तो कोई खास दिन की जरूरत नही होती पर कुछ खास मौके मिलें तो अपनों से अपने मन की बात जरूर कहनी चाहिए। आज जब friendship day का मौका मिला है तो मैं अपने उन सभी दोस्तों को जो मेरे जीवन का औऱ मेरी यादों का एक अभिन्न हिस्सा हैं , मेरे जीवन में आने के लिए शुक्रिया कहने का मौका छोड़ कैसे सकती हूं?

मेरी सबसे पहली दोस्त, मेरी बहन भारती जो बहुत जल्दी मेरा साथ छोड़ गई पर आज भी मेरे सबसे करीब है। मेरी आईजी और आमा जो मेरे सबसे बड़े मार्गदर्शक तो हैं, पर जिनमे मैंने हमेशा एक दोस्त पाया। मेरी चारों बुआएँ जो हम बच्चों की हमेशा हमजोली रही और आज भी दोस्त ही हैं। उर्मि दी, जिसके साथ गर्मी की छुट्टियों में सबसे ज्यादा मजे किये। जिसके साथ खेल खेल में कितनी चीजें सीखी और मैंने तो झगड़ा भी बहुत किया।

बचपन से ही मैं घर मे जितना हर वक्त बोलती रहती स्कूल में थोड़ा कम ही बोलती थी और मेरे दोस्त भी गिनती के थे। बचपन के उन साथियों भावना, नेहा, प्रियंका ,निधि और अपर्णा के साथ कई अनमोल यादें जुड़ी हैं मेरी जीवन की। बचपन के मेरे ये दोस्त आज भी मेरे जीवन का एक अनमोल हिस्सा हैं।

कोमिला और हिमानी से मेरी दोस्ती कॉलेज में हुई पर उनके साथ कॉलेज जाना,गुरुवार शाम को साईं मंदिर और फिर हमारे गेट पर घंटो बात करना जब तक आमा या आईजी की डाँठ न पड़े उसका मजा कुछ और ही था।


पंतनगर गयी तो पीयूष मैम, हिमांशु सर ,अंजना दी कविता मैम, सोनी मैम, प्रतिभा मैम जैसे सीनियर मिले जिनके पास अपनी छोटी बड़ी हर परेशानी लेके पहुंच जाती थी और जो एक पल में हल खोज लेते थे।

मेरी रूम मेट प्रिया के साथ हँसते हँसते पंतनगर के पांच साल कैसे निकले पता ही नही चला।

पंतनगर में ही मुझे ऐसी सहेली मिली जिसने मेरी बेटी के जीवन में मौसी की कमी नही होने दी। मेरी सबसे खास सहेली रश्मि। रश्मि के साथ में सिर्फ दो साल रही पर उसके साथ दिल का रिश्ता पहले दिन ही जैसे जुड़ गया था।

नीरजा, प्राची, मेघना, वैशाली, सुषमा, तृप्ति , बुशरा, हर्षल, शालिनी, जस्मिन इन्ही दोस्तों की वजह से घर से कई मील दूर औरंगाबाद में छै साल खुशी खुशी निकल गए।
औरंगाबाद ने ही मुझे मिलाया मेरी मोनिका दी से। सबसे अलग, थोड़ी गुस्से वाली पर अंदर से उतनी ही नरम। मोनिका दी में जैसे मुझे मेरा पूरा परिवार मिल गया औरंगाबाद में।

कई साल पहले मैंने दोस्ती पर एक कविता लिखी थी। आज मैं वही कविता अपने सभी दोस्तों को समर्पित करते हुए शुक्रिया कहना चाहती हुँ, मेरे जीवन मे आने के लिए और उसे अनमोल यादों से सजाने के लिए। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे दिल हमेशा ऐसे ही जुड़े रहेंगे।

को भै दगड़ी……

दगड़ी !!
दगड़ी जसि आलू गुटक दगड़ रैत।
दगड़ी जसि भिटौली में मैत।
दगड़ी जसि सिल और बाट्।
दगड़ी जसि चाखक पाट्।
दगड़ी जसि बड़ी मैं काकड़।
दगड़ी जसि शगुना आंखर।

दगड़ी भै नींबू में भांग जस।
दगड़ी भै ह्यूनक घाम जस ।
दगड़ी भै गहतक दाल मैं जम्बुक् धुँआर जस ।
दगड़ी भै पालक् तिनड़् दगड भुनी खुश्याण जस।
घरै छत मैं दगड़ी भै पटाल जस।
जीवन गीत मैं दगड़ी भै हुड़कीक् थाप जस।

जेठ मैं नौलक पाणि जसिक दे तराण उ भै दगड़ि।
हिसाउ किल्माैड़ि जसि मणि खटृ मणि मिठ् भै दगड़ि।
सिल पिसी लुण जसि चट्पट् भै दगड़ि।
चाहा दगड़ मिसरीक् टपकी भै दगड़ि।
रत्त् ब्याँणक् उजयाव ,ब्यावक दी-बात् भै दगड़ि।
आई के बतूं मि, म्यार लिजी को भै दगड़ि।

रंग्वाली पिछौड़ा

अपनी बेटी के साथ न जाने कितनी बार अपने बचपन को फिर से जी लेती है माँ।

आज मेरी बिटिया जब मेरी साड़ी लपेट के खेलने लगी तो मुझे फिर मेरे बचपन के वो दिन याद आ गए जब मैं भी आईजी या आमा की साड़ी पहन कर इतराती रहती थी। कोई त्यौहार आये तो आईजी रंग्वाली पिछौड़ा पहनती, और जैसे ही आईजी पूजा के बाद पिछौड़ा उतारती,मैं और मेरी बहन बारी-बारी से पिछौड़ा ओढ़ कर शीशे के सामने इठलाते रहते।

मुझे याद है मेरी बुआ की शादी में जब बुआ के लिए पिछौड़ा बन रहा था,तब शायद मैं सात या आठ साल की थी और जिद करने लगी कि मुझे भी ऐसा ही पिछौड़ा चाहिए तो आमा ने मेरे लिए भी एक छोटा सा टुकड़ा रंगवा दिया था। बड़ी खुश हुई थी  मैं अपना खुद का पिछौड़ा पाकर। ये बात और है कि बाद में आमा ने मुझे बड़े प्यार से समझा दिया था कि पिछौड़ा तो लड़कियां शादी के बाद ही पहनती हैं और वो पिछौड़ा फिर दीवाली में मंदिर में बनी देवी का श्रृंगार बना। अब वो पिछौड़ा किस के लिए बनवाया था आमा ने ये आज भी रहस्य ही है।😊

खैर ये तो बचपन की बात थी पर बड़े होते होते पिछौड़े का असल महत्व भी समझ आया। पीले रंग से रंगा, फिर लाल बूटों से सजा ये दुपट्टा सिर्फ एक श्रृंगार ही नहीं है। पीले रंग के साथ इसमें समाता है ,जाने कितने बड़े-बूढों का प्यार, स्नेह और आशीर्वाद। जब रंगते हैं लाल बूटों से इसे तो साथ में दुल्हन भी रंगती है जाने कितने सपने अपने नए जीवन के। और जब ओढ़ती है इसे, तो साथ मे अपनाती है नई जिम्मेदारियां अब एक नहीं दो-दो परिवारों की।

हर शादी-ब्याह,तीज-त्यौहार में पहना जाने वाला, और फिर अच्छे से संभाल कर रख दिया जाने वाला ये पिछौड़ा कुछ कुछ जीवन के खट्टे-मीठे रिश्तों जैसा ही होता है। यूँ तो जीवन के हर अवसर को और रंगीन बनाता है,पर जरा सी नमी लगे तो रंग छोड़ भी देता है। अपने रंगों के साथ ही रिश्तों को सहेज के रखने की सीख भी देता है ये पिछौड़ा।

हमारी संस्कृती की पहचान इसी रंग्वाली पिछौड़े को कलमबद्ध करने की एक छोटी सी कोशिश……

पहले तो सफेद ही था,फिर हल्दी से रंगा गया। 

खूब धूम-धाम थी उस दिन, जिस दिन मैं रंगीन बना।

ढोलकी मंजीरे के मधुर सुरों में आमा ने  गाया शकुनाखर।

लाल-लाल बूटों से सजाया, ज्येड़जा-कैंजा-काखी और ईजा ने मिलकर।

खूब ख़ुशी का दिन था वो, जब मुझे नई पहचान मिली।

प्यार, स्नेह और आशीर्वाद से रंग्वाली मैं कहलाया।।

एक कपड़े का टुकड़ा ही था, पर अब एक श्रृंगार बना।

नई नवेली दुल्हन की, एक नयी पहचान बना।

बिंदी-चूड़ी- मंगलसूत्र -बिछिया- नथ औऱ पायल,

सबसे अलबेला स्थान मिला,ओढ़ा जब मुझे सर से ऊपर।

दुल्हन का रूप औऱ निखार, मैं अपने आप ही इतराया।

प्यार  स्नेह और आशीर्वाद से रंग्वाली मैं कहलाया।।

जीवन के हर शुभ अवसर को, मैंने और रंगीन किया।

लिहाज किया घूंघट बनकर कभी, कभी आँचल की छाँव बना।

जाने कितनी आशीषें ली और कितने आशीर्वाद दिए।

सहेज के फिर संभला रहा, बक्से में और यादों में भी

यादों के उन्ही लम्हों को पुनः पुनः, बक्से में जी के मुस्काया।

प्यार स्नेह औऱ आशीर्वाद से रंग्वाली मैं कहलाया।

फिर एक दिन ऐसा भी आया,जब फिर बक्से से निकाला गया।

खुशी नहीं थी उस दिन तनिक, गमगीन था सारा मौसम।

असमंजस में पड़ा रहा एक कोने में, जाने कैसा था वो दिन।

ना ढोलक थे, न मंजीरे थे, न संगीत की कोई भी धुन ।

तभी किसी ने ओढ़ा दिया मुझे, मेरी दुल्हन के ऊपर।

आज भी श्रृंगार ही था, पर आज न इतरा पाया।

सौभाग्यशाली वो कहलाई ,उसने मुझको था अपनाया।

प्यार स्नेह और आशीर्वाद से रंग्वाली मैं कहलाया।

आमा और आईजी की रसोई से: पुआ

पुआ … नाम लेते ही आंखों में एक चमक सी आ जाती है। याद आ जाती है अपने जन्मबार की वो सुबह जब आमा और आईजी की रसोई में बनते थे कई पकवान और सबसे पहले बनता था पुआ। बड़ी सी पीतल की वो परात जिसमे सुबह होने से पहले ही भिगो दी जाती सूजी,पके हुए केलों और हमारी गाय चनुली के दूध से घर में ही जमाये हुए दही के साथ और फिर कुछ ही देर बाद तैयार हो जाते गर्मा-गर्म पुए। आमा और आईजी की तरह ही बाहर से कुरकुरे पर अंदर से उतने ही नरम और मीठे मीठे पूए।

सबसे पहले भोग भगवान को और फिर उसके बाद बस गरमा-गरम न जाने कितने चट कर जाते हम सब कि थोड़ी देर तो लगता अब दिन भर कुछ और न खाया जाएगा। पेट भर जाता पर मन नहीं।

कोई मेहमान कई दिन बाद आये या हो भिटौली का महीना। बेटी मायके आयी हो या फिर ससुराल जा रही हो। पूए का अपना एक अलग ही स्थान है। एक ऐसा स्वाद है यह पहाड़ का जिसके बिना पहाड़ का भोजन ही नहीं, हर त्योहार अधूरा है।

मेरी आमा की रसोई में कभी-कभी पुए बिना किसी खास मौके के भी बन जाते थे। गर्मियों में अकसर बनने वाला ये खास व्यंजन आमा बनाती आटे और गुड़ से। जब मैं छोटी थी तब पहाड़ में फ्रिज की आवश्यकता नहीं थी। पहाड़ का मौसम बारहों महीने सुहावना ही रहता पर फिर भी अगर रात को गूँधा आटा बच जाए तो उसमें कभी-कभार खमीर चड़ ही जाता। अब क्या किया जाय? बस उसी आटे में आमा घोलती थोड़ा गुड़ और ढेर सारी ममता और बन जाते नरम-नरम पुए,जिनको सब परिवार के साथ बाँट कर खाने का आंनद शब्दो मे व्यक्त कर पाना मुश्किल है।

आज अपने बच्चों के जन्मदिन पर और हर त्योहार पर पुए में भी बनाती हुँ, जिन्हें बच्चे बड़े चाव से खाते भी हैं। पर जो स्वाद आमा और आईजी की रसोई में बने पुओं में आता था वो लाना मुश्किल है। शायद वो स्वाद था पहाड़ के शुद्ध पानी का, पीतल की परात का, हमारी गाय चनुली के ताजे दूध का और ढेर सारी ममता का…..

लड़का एक खाता केक🎂

हमारी आमा

कुछ दिन पहले मेरी बेटी के स्कूल में Dr.Seuss का जन्मदिन मनाया गया। Dr.Seuss बच्चों के साहित्य में अपने काल्पनिक पात्रों और rhyming words (तुकांत शब्दों) के बड़े ही मनोरंजक उपयोग के लिए अत्यंत लोकप्रिय हैं। मेरी बेटियों और मुझे भी बहुत पसंद है उनकी लिखी Cat in The Hat और Green Eggs and Ham.
      जब हम छोटे थे तब Dr.Seuss के बारे में तो नहीं पता था पर हाँ ऐसी ही कई कविताएँ और कहानियां थी जो हम बच्चों के बीच बहुत लोकप्रिय थी। ऐसी ही एक कविता है लड़का एक,खाता केक…

ये कविता कुछ खास इसलिए भी है क्योंकि ये कविता मेरी आमा की सबसे पसंदीदा कविता थी और अपने जीवन के आखिरी वर्षो में जब एल्जाईमर्स के कारण वो अकसर हमें पहचान भी नही पाती तो ऐसे में मेरी माँ या भाई जब उसके पास आकर जोर से कहते, लड़का एक… ? तो जैसे उसकी याददाश्त लौट आती और वो पूरी कविता फटाफट सुना देती।

लड़का एक, खाता केक।🎂
लड़की दो, जाती सो।👯
ग्वाले तीन, बजाते बीन।🎷🎷🎷
गुडियां चार, पहने हार।📿📿📿📿
परियां पांच, करती नाच।💃💃💃💃💃💃
बकरी छै, करती मै।🐐🐐🐐🐐🐐🐐
घोड़े सात,मारते लात।🐎🐎🐎🐎🐎🐎🐎
पंडित आठ,पड़ाते पाठ।👩‍🏫👩‍🏫👩‍🏫👩‍🏫👩‍🏫👩‍🏫👩‍🏫👩‍🏫
चिड़ियाँ नौ, चुगती जौं।🐦🐦🐦🐦🐦🐦🐦🐦🐦
रुपये दस, अब करो बस।🛑

         ऐसे में बिस्तर पर लेटी हमारी आमा कभी चार साल की बच्ची सी लगती जो अपने टीचर को पूरी कविता सुना के बांकी बच्चों के सामने इतरा  रही हो कि देखो मुझे पूरी कविता याद है और कभी वापस आ जाती वो आमा जो जाड़ों की गुनगुनी धूप में अपने छोटे-छोटे नाती-पोतों की मालिश करते-करते उन्हें गिनती भी सिखा रही हो।

ऐसी कई सारी कहानियाँ और कविताएँ हैं पर बांकी फिर कभी…

काले कौआ काले, घुघुति माला खाले।

यादों के समंदर से आज निकल के आया है एक ऐसा त्योहार जो वैसे तो पूरे भारत मे बड़ी धूम से मनाया जाता है पर पहाड़ में इसे मनाने का ढंग सबसे खास है। ये त्योहार है काले कौआ यानी घुघुतिया। माघ मास की संक्रांती को मनाया जाने वाला यह पर्व जिसे अन्य प्रदेशों में मकर संक्रांति, पोंगल, बीहू या उत्तरायण भी कहा जाता है,त्योहार है शीत ऋतु के अंत का, बसंत के आरंभ का और प्रवासी चिड़ियों के पहाड़ वापसी पर स्वागत का ।

यूँ तो इस त्योहार में कई रसमें होती हैं, जैसे खिचड़ी दान , स्नान आदि पर जाड़ों की छुट्टियां, मीठे घुघुते- खजूरे, सब बच्चों के लिए बनने वाली घुघुते की माला, माला में पिरोये जाने वाले तलवार , ढाल, ढोलकी, दाड़िम के फूल और सबके बीच मे संतरा, सुबह सुबह उठ कर कौओं को आवाज देना और ये ध्यान रखना की पड़ोस में सबसे तेज आवाज हमारे घर से ही आनी चाहिए, यही सब तो था जो इस त्योहार को हम बच्चों के लिए खास बना देता था।

शाम को जब सारे बच्चे आबू के साथ बैठते तब बीच मे रखे सगड़ में सुलगते कोयले की खुशबू और गर्म राख में सिक रहे आलू और गेठी का स्वाद जबाँ पर आज भी वैसे ही ताजा है जैसे घुघुतिया में सुबह गाया जाने वाला गाना।

काले कौआ काले घुघुति माला खा ले।
लै कौआ भात में कै दे सुनौक थात।
लै कौआ लगड़ में कै दे भै बेनियोंक दगड़।
लै कौआ बड़ में कै दे सुनौक घ्वड़।
लै कौआ तलवार में कै दे भलो भल परिवार।
लै कौआ ढाल में कै दे सुनक थाल।
काले कौआ काले घुघुति माला खाले।

जाड़ों की छुट्टियों में आमा और आबू के साथ हर शाम सारे बच्चे सबसे पहले हनुमान चालीसा गाते थे। फिर कभी गणित के पहाड़ों , कभी कविताओं या श्लोकों की परीक्षा देनी होती। पर मकर संक्रांती का दिन तो खास था। गुड़ और आटा गूंध जब मां ले आती तो फिर सब जुट जाते अपनी अपनी कलाकारी दिखाने में। पहले बनते घुघुते, फिर तलवार, ढाल , दाड़िम के फूल, ढोलकी और आखिर में कटते खजूरे। बड़ी सी परात में आमा सब तल के ले आती और फिर बनती माला सबके लिए, जो बच्चे घर पे हैं उनके लिये भी और जो छुट्टियों में बाहर गए हैं उनके लिए भी। पड़ोस में भी सबके लिए एक-एक। कोई छूटना नहीं चाहिए।माला बनाते-बनाते आबू सुनाते कहानी काले कौआ त्योहार की।

“बहुत पहले की बात है, कुमाऊं में चन्द्र वंश के राजा कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी ।एक बार राजा बाघनाथ मंदिर में गए और संतान के लिए प्रार्थना की। बाघनाथ की कृपा से उनका एक बेटा हुआ। मां प्यार से बेटे को ‘घुघुति’ के नाम से बुलाया करती थी। घुघुति के गले में एक मोती की माला थी जो घुघुति को बहुत पसंद थी। जब वह कहना नही मानता तब उसकी मां उससे कहती कि जिद मत कर, नहीं तो मैं माला कौवे को दे दूंगी और कहती कि “काले कौआ काले घुघुति माला खा ले”। धीरे-धीरे घुघुति की कौवों के साथ दोस्ती हो गई। तभी राजा के मंत्री ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक षड्यंत्र रचा। एक दिन जब घुघुति खेल रहा था, तब वह उसे चुप-चाप उठाकर ले गया। जब वह घुघुति को जंगल की ओर लेकर जा रहा था, तो एक कौवे ने उसे देख लिया और जोर-जोर से कांव-कांव करने लगा। उसकी आवाज सुनकर घुघुति रोने लगा और अपनी माला दिखाने लगा। कौआ घुघुति से माला झपटकर ले गया। वह सीधे महल में जाकर एक पेड़ पर माला टांगकर जोर-जोर से कांव- कांव करने लगा लगा ।जब लोगों की नजरें उस पर पड़ीं तो माला सभी ने पहचान ली। राजा और उसके सैनिक कौवे के पीछे लग गए। कुछ दूर जाकर कौआ एक पेड़ पर बैठ गया। राजा ने देखा कि पेड़ के नीचे उसका बेटा सोया हुआ है। उसने बेटे को उठाया, और घर को लौट आया। घुघुति के मिल जाने पर मां ने बहुत सारे पकवान बनाए और घुघुति ने कौवों को बुलाकर खाना खिलाया । तब से हर साल इस दिन धूमधाम से इस त्योहार को मनाते हैं

“काले कौआ काले घुघुति माला खा ले” की आवाज संक्रांती की अगली सुबह आज भी पूरे पहाड़ में गूंजती है। आज भी पहाड़ में घुघुते की माला का मकर संक्रांति में उतना ही महत्व है जितना कि इस दिन गंगा स्नान का या फिर खिचड़ी दान का। आज भी आमा और नानी मेरी बेटियों के लिए माला बनाना नही भूलती।

आज पहाड़ से दूर होकर भी मेरी हमेशा यही कोशिश रहती है कि हमारी संस्कृति को अगली पीढी तक पहुंचा सकूँ। संक्रांति के दिन जब बच्चे सुबह -सुबह पूरे जोश में काले कौआ गाते हैं तो उनके साथ मैं भी जैसे पहुँच जाती हूँ अपने बचपन में ,अपने घर के आंगन में,अपने पहाड़ में।

*फूलदेई, छम्मा देई*

लगभग छः महीने पहले जब मैंने अपनी छोटी- छोटी पर अनमोल यादों को साझा करने का विचार किया तब जो शब्द सबसे पहले मन में आया उसी शब्द से जुड़े एक अनोखे त्योहार की यादों के साथ आज उस कड़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हूं।

फूल देई जिसे फूल संक्रांत भी कहते हैं, चैत्र मास की संक्रांति को मनाया जाने वाला एक पर्व है प्रकृति का, फूलों का और हमारी प्यारी बेटियों का।

इस त्योहार का नाम लेते ही याद आते हैं, चारों तरफ खिले खुमानी, पुलम, आडू के सफेद, गुलाबी और बैंगनी फूल जो सुंदरता में विदेशों के चेरी ब्लॉसम (cherry blossom frstival) को कहीं पीछे छोड़ दें। बसंत का यह त्योहार हर घर आंगन में ले के आता है रंग बिरंगे फूल। गुलाब,गुड़हल,जिरेनियम और नारंगी रंग का मेरा सबसे पसंदीदा नेसटरटीयम ( Nasturtim) जिसके फूल सुंदर तो होते ही पर गोल गोल पत्तियां हमारे गुड़ियों के घर-घर खेल में कभी थाली तो कभी रोटी की भूमिका निभाते।

फूल देई की तैयारी एक दिन पहले ही शुरू हो जाती जब घर की सारी देलियो को सजाया जाता सुंदर ऐपणों से। जो बच्चे छोटे हैं, उनका काम होता हर देहली को गेरू से लाल रंगना। थोड़े बड़े हो तो बसुंधरे (देहली में ऊपर से नीचे डाली जाने वाली खड़ी पंक्तियाँ ) डाल सकते हो, और सबसे अनुभवी का काम होता ऐपण देना। आज समझ आता है कि काम पहले भी फाइन मोटर स्किल्स (fine motor skills) के हिसाब से ही कराये जाते थे पर उनके लिए जैसे मेरी बेटी कहती है फैंसी शब्द नही थे।

संक्रांति के दिन सुबह सुबह उठ कर सबसे पहले फूल इक्कठे किये जाते। फिर अपनी थाली जिसमे आमा ने पहले ही चावल और गुड़ रखा होता, सजाई जाती। मुझे याद है कि कभी-कभी तो इतवार होता मगर अकसर स्कूल होता था तो फिर स्कूल के लिए तैयार होकर हम बच्चे शुरू करते देहली पूजना।

आस पड़ोस के बच्चे सब इकट्ठे हो जाते और खेतों के रास्ते कूदते फांदते स्कूल जाने से पहले अपने घर के साथ-साथ पड़ोस में रहने वाली हर ताईजी, बुआ, चाची, मामी,आमा सबके घर की देहली पूज प्रत्येक घर की समृद्धि की प्रार्थना कर आते और साथ मे ले आते चावल, गुड़, पैसे और ढेर सारा आशीर्वाद।

हमारे स्कूल जाने पर खत्म नही होता था ये सिलसिला। बच्चों का कार्यक्रम हो जाने पर अब आती बारी आमा, मां, चाची , ताईजी और बुआ की। आज तो सबको मौका मिलता अपने मायके जाने का। सबका मायका एक ही शहर में हो ऐसा तो नही हो सकता। पर मायके जैसा ही प्यार देने वाला एक घर तो जरूर होता, फिर चाहे वो बड़ी दीदी का हो या बुआ का या फिर गांव वाली ताईजी और चाची का। उनके घर की देहली भी जरूर पूजती वो बेटियां जो अपने मायके नही जा पाती।

शाम को आमा या माँ बनाती सै (चावल का हलवा), आलू के गुटके और पूरी। बुआ घर आती और हम माँ के साथ ताईजी और मामी के घर भी जाते देहली पूजने और पूरा दिन बस यूँ ही मिलने जुलने में बीत जाता।

घर से दूर आकर अब त्योहार पे सबसे मिलना तो हो नही पाता पर आज भी जब मेरी बेटियां संक्रांति के दिन देहली पूजती हैं तो बचपन की सब यादें फिर से दस्तक दे जाती हैं। अच्छा लगता है जब घर पे बात करती हुँ और सुनती हुँ की आज भी बच्चों में वही जोश रहता है और आज भी बच्चे पड़ोस की कोई देहली पूजना नही भूलते।

ये छोटे-छोटे रिवाज और त्योहार एक धरोहर हैं, जो कई रिश्तों को आपस मे जोड़े हुए हैं और उम्मीद है आगे भी जोड़े रखेंगे क्योंकि हर देहली समृद्ध रहे और हर देहली से हमारा रिश्ता हमेशा जुड़ा रहे यही प्रार्थना तो करते है हम ।

फूलदेई, छम्मा देई,
दैंणी द्वार, भर भकार,
य देई में हो ख़ुशी अपार,
य देई कैं, बारम्बार नमस्कार।
फूलदेई, छम्मा देई।

देहली,आँगन और गौरैया…

 मैं पहाड़ का एक हिस्सा हुं। यहीं पे मैं पैदा हुयी, यहीं खेली कूदी और बड़ी हुयी। यहीं पे सीखा मैने जीवन जीना ओर यहीं पर मेरा व्यक्तित्व विकसित हुआ। आज बचपन तो कहीं पीछे छूट गया पर कभी कभी अपने बच्चों का बचपन देखती अनायास ही मैं भी अपने बचपन में पहुंच जाती हूँ। इतनी सारी यादें हैं पर आज भी नई सी लगती हैं।

           यादें हैं एक परिवार की, आमा की और  बरबाजू की जिन्हें हम बच्चे आबू कहा करते थे। घर का वो आंगन जिसके एक कोने में सूखती थी बड़ियाँ और वहीं दूसरे कोने में सनता था निम्बू। जाड़ों में उसी आंगन में गुनगुनी धूप में पड़े रहते हम अपनी किताबो के साथ जिनको भी शायद धूप बड़ी पसंद थी। उसी आंगन में अड्डू, दानी, अस्सी कस्सी, पोशम्पा भई पोशम्पा,खो खो और सेवन टाइम्स खेलते रहते थे जब तक सूरज पूरी तरह ढल न जाये। रक्षाबंधन पे पतंग उड़ाते दा को छटंगी देने का मजा ही कुछ और था।

           खेत में लगी लाई  और लोहे की कढ़ाई का जबरस्त मेल था। रस-भात, चैसें, डुबके, गडेरी का साग ,भड्डू वाली दाल, बच्चो के लिए झोली तो कभी बड़ी-भात,कई स्वाद थे आमा की रसोई के जिसे अगर गलती से छू लिया तो बेचारी धोती पहन के खाना बनाती आमा सबको खिला के भी भूखी रह जाती।

           कितना सुकून मिलता था जब छत पे बने गौरैया के घोंसलों से छोटे छोटे बच्चे ची-ची करते रहते। रोज सुबह उठ के मादिरे के दाने चुगती वो चिड़ियॉ, बारहों महीने घर की शोभा बड़ाती थी। बरसात के मौसम में टीन कि छत पर होने वाली तड़तड़ाहट का शोर कुछ अलग ही मजा देता था। गर्मियों में बुआ घर आती फिर सब मिलके चितई पैदल ही हो आते और थकान क्या होतीहै ये कौन जाने। 

           घुघुति, हरेला हो या होली-दीवाली सुबह-सुबह नहा धो के पुआ, बड़ा और सिंगल खाने का अलग ही आनंद था। फूल देई पर पूरे पड़ोस की ऐपन से सजी  देहलिया पूजना हो या दीवाली पे पूरे घर पे मुट्ठी से पौ निकालने हों या फिर रामलीला देखने जा पाएँ इसलिए फटाफट घर के काम निपटवाने हों हर एक चीज में हमेशा जोश भरा रहता।

            आंगन में पटालों के बीच उगने वाली वो दुवै की जड़ जैसी हैं ये यादें बचपन की, जो जरा सी नमी मिलते ही हरी-भरी हो जाती हैं…बस ऐसी ही कुछ यादें  हैं ये ‘स्वाद पहाड़ का’!

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