माघ मास की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला त्यौहार जिसे हम श्री पंचमी या बसंत पंचमी के नाम से जानते हैं, अपने साथ लेकर आता है उम्मीदें और नया विश्वास कि चाहे पूस का महीना कितना भी लम्बा और सर्द हो बसंत ऋतू अपने साथ नयी कोपलें,नयी फसलें ,फूल और खुशहाली लेकर अवश्य आतीपढ़ना जारी रखें ” आयो नवल बसंत”
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दिया और बाती
इस दिसंबर आमा को गए तीन साल पूरे हो गए पर आज भी कई रूपों में हमेशा आस पास ही रहती है। आमा कभी भी खाली नहीं बैठती थी। रसोई निबटा के जब धूप मैं बैठने आती तो हाथ में या तो बुनाई के लिए ऊन होता या फिर आसन काढ़ने के लिए सुई। एकपढ़ना जारी रखें “दिया और बाती “
घी त्यार
आज घी संक्रान्ति है और पहाड़ के हर घर में, या यूँ कहूँ हर पहाड़ी के घर में, चाहे आज वो पहाड़ से कितनी ही दूर हो, एक विशेष पकवान जरूर बनेगा। और ये पकवान है गरमा-गर्म, खूब सारे घी में डूबी बेडुआ रोटी। डाइटिंग पे हो???? कोई बात नहीं ,आज तो घी खानापढ़ना जारी रखें “घी त्यार”
मॉं नंदा , दैणी है जाये।।
पहाडों की गोद में बचपन बीता हो और नंदा देवी के मेले से जुड़ी यादें न समेटी हों! ये मुश्किल है। यूँ तो कई साल हो गए अल्मोड़ा में लगने वाले नंदा देवी के मेले का आनंद लिए हुये पर आज भी मेले की तिथी आते ही कानों में जैसे वो फूंक मारकर बजने वालेपढ़ना जारी रखें “मॉं नंदा , दैणी है जाये।।”
*फूलदेई, छम्मा देई*
लगभग छः महीने पहले जब मैंने अपनी छोटी- छोटी पर अनमोल यादों को साझा करने का विचार किया तब जो शब्द सबसे पहले मन में आया उसी शब्द से जुड़े एक अनोखे त्योहार की यादों के साथ आज उस कड़ी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हूं। फूल देई जिसे फूल संक्रांत भी कहतेपढ़ना जारी रखें “*फूलदेई, छम्मा देई*”